
जन्म: 6 अप्रैल 1956
पूरा नाम: श्रीनिवासन
जन्म स्थान: पट्टियम, थालस्सेरी के पास, कन्नूर ज़िला, केरल
पेशा: अभिनेता, पटकथा लेखक, निर्देशक
निधन: शनिवार, 69 वर्ष की उम्र में
समय: सुबह 8:22 बजे
कारण: डायलिसिस के लिए ले जाते समय तबीयत बिगड़ना
अस्पताल: त्रिपुनिथुरा तालुक अस्पताल
पार्थिव शरीर: तालुक अस्पताल में रखा गया
अंतिम संस्कार: जानकारी बाद में घोषित की जाएगी
करियर अवधि: लगभग 5 दशक
अभिनय: 225+ फिल्में
प्रमुख पटकथाएँ:
नादोडिक्कट्टू, पत्तनप्रवेशम, वरवेल्पु, संदेशम, मिधुनम,
थलायणा मंत्रम, उडयनानु थारम, कथा परयुम्पोल, नजान प्रकाशन
निर्देशक के रूप में फिल्में:
वडक्कुनोक्कियंत्रम, चिंताविष्टायया श्यामला
प्रमुख पुरस्कार:
• राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
• 2 फिल्मफेयर साउथ अवॉर्ड
• 6 केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड
पहचान:
सामाजिक व्यंग्य, आम आदमी के किरदार, यथार्थवादी अभिनय और साफ-सुथरी राजनीति-समझ
योगदान:
मलयालम सिनेमा के स्वर्णिम दौर की नींव रखने वाले सबसे प्रभावशाली रचनाकारों में शामिल
मलयालम सिनेमा के मजबूत स्तंभ श्रीनिवासन का निधन, एक युग का अंतमलयालम सिनेमा के इतिहास में शनिवार का दिन एक गहरी खाली जगह छोड़ गया, जब अभिनेता, लेखक और निर्देशक श्रीनिवासन का 69 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे लंबे समय से किडनी से जुड़ी समस्या से जूझ रहे थे और डायलिसिस के लिए ले जाए जा रहे थे, तभी रास्ते में उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें तुरंत त्रिपुनिथुरा तालुक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ सुबह 8 बजकर 22 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका पार्थिव शरीर फिलहाल अस्पताल में रखा गया है और अंतिम संस्कार की जानकारी परिवार द्वारा बाद में दी जाएगी।6 अप्रैल 1956 को केरल के कन्नूर ज़िले के पट्टियम गांव में जन्मे श्रीनिवासन ने मलयालम सिनेमा को सिर्फ हँसी नहीं दी, बल्कि सोचने की वजह भी दी। वे उन चुनिंदा कलाकारों में थे, जिन्होंने हास्य को मनोरंजन से आगे ले जाकर समाज का आईना बना दिया। उनकी फिल्मों में दिखने वाला आम आदमी दर्शकों को अपना सा लगता था, क्योंकि उसमें दिखावे से ज़्यादा सच्चाई होती थी।करीब पाँच दशकों के अपने करियर में श्रीनिवासन ने 225 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया और दर्जनों ऐसी पटकथाएँ लिखीं, जो आज भी मलयालम सिनेमा की सबसे मजबूत रचनाओं में गिनी जाती हैं। ओडरुथम्मावा आलारियम, नादोडिक्कट्टू, पत्तनप्रवेशम, वरवेल्पु, संदे़शम, मिधुनम, थलायणा मंत्रम जैसी फिल्में सामाजिक व्यंग्य की मिसाल बन गईं। इन फिल्मों में उन्होंने बेरोज़गारी, राजनीतिक पाखंड, पारिवारिक तनाव और मध्यम वर्ग की उलझनों को सरल लेकिन असरदार अंदाज़ में पेश किया।लेखक के तौर पर श्रीनिवासन की सबसे बड़ी ताकत उनकी स्पष्ट सोच और नैतिक स्पष्टता थी। उनकी कहानियाँ कभी भाषण नहीं बनती थीं, लेकिन दर्शक फिल्म खत्म होने के बाद भी उसके संदेश के बारे में सोचने पर मजबूर हो जाता था। संदेशम जैसी फिल्म आज भी राजनीतिक व्यंग्य की सबसे बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती है।अभिनेता के रूप में भी श्रीनिवासन का अंदाज़ बेहद सधा हुआ था। वे नायक की चमक-धमक से दूर, आम आदमी की भूमिका में ज़्यादा सहज दिखते थे। उनकी अभिनय शैली में नाटकीयता कम और यथार्थ ज़्यादा होता था। यही वजह है कि उनके किरदार दर्शकों के दिलों में लंबे समय तक बसे रहते थे।निर्देशक के रूप में उन्होंने कम लेकिन यादगार फिल्में बनाईं। वडक्कुनोक्कियंत्रम ने पुरुष अहंकार और असुरक्षा जैसे विषयों को हास्य के साथ प्रस्तुत किया और इसे केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ फिल्म) मिला। वहीं चिंताविष्टायया श्यामला को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (अन्य सामाजिक विषयों पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म) से सम्मानित किया गया। इन फिल्मों ने साबित किया कि मनोरंजन और सामाजिक जिम्मेदारी साथ-साथ चल सकते हैं।अपने करियर के दौरान श्रीनिवासन को कई बड़े सम्मान मिले, जिनमें नेशनल फिल्म अवॉर्ड, दो फिल्मफेयर साउथ अवॉर्ड और छह केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड शामिल हैं। संदेशम और मझयेतुम मुन्पे के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पटकथा का राज्य पुरस्कार भी मिला।श्रीनिवासन ने प्रियदर्शन, सथ्यान अंथिकाड़, कमल जैसे दिग्गज निर्देशकों के साथ लगातार काम किया और मलयालम सिनेमा के उस स्वर्णिम दौर को आकार देने में अहम भूमिका निभाई, जब हास्य फिल्मों में भी गहरी सामाजिक समझ देखने को मिलती थी।उनकी आखिरी दौर की फिल्मों में उडयनानु थारम, कथा परयुम्पोल और नजान प्रकाशन शामिल हैं। खासकर नजान प्रकाशन ने बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल की और यह साबित किया कि अच्छी कहानी कभी पुरानी नहीं होती।श्रीनिवासन का जाना केवल एक अभिनेता का जाना नहीं है, बल्कि उस सोच का अंत है, जो सिनेमा को समाज से जोड़कर देखती थी। मलयालम सिनेमा में उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी, लेकिन उनकी फिल्में और किरदार उन्हें हमेशा ज़िंदा रखेंगे।